स्वाइन फ्लू के कारण, लक्षण और इलाज

स्वाइन फ्लू के कारण, लक्षण और इलाज

क्या आप जानते है, स्वाइन फ्लू ( Swine flu ) एक बार फिर से दुनिया भर में बहुत तेजी से फेल कर लोगो को अपने चपेट में ले रहा है। यह एक संक्रामक साँस रोग है। जो बहुत खतरनाक बीमारी है। मौसम बदलने के साथ ही इस रोग के वायरस फैलने लगते है। इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको बताएँगे सुअर इन्फ्लूएंजा के कारण, लक्षण और इलाज ( Swine flu: Causes, symptoms, and treatment ) ।

स्वाइन फ्लू के कारण, लक्षण और इलाज

स्वाइन फ्लू किया है ?

Swine flu जिसे सुअर इन्फ्लूएंजा ( Swine influenza ), स्अर फ्लू या शूकर फ्लू भी कहते हैं। यह स्वाइन इन्फ्लूएंजा एक संक्रामक सांस की रोग है। यह एक तरह का वाइरल बुखार की तरह होता है। पर ये बहुत खतरनाक है। इस रोग के लक्षण दीखते ही, इलाज कराया जाये तो रोगी की जान बचाई जा सकती है, वरना मानव की मर्त्यु तक हो जाती है।

स्वाइन फ्लू कैसे होता है ?

ये एक वायरस जनित रोग है, जब स्वस्थ मनुष्य इसके वायरस के सम्पर्क मे आता है, स्वाइन फ्लू हो जाता है। और सर्दी, जुकाम, बुखार जैसी कई तरह की समस्या होने लगती है। जिससे रोगी की मत्यु तक हो जाती है।

स्वाइन फ्लू किसके कारण होता है ?

H1N1 वायरस के कारण स्वाइन फ्लू होता है। H1N1 virus बहुत तेजी से एक मानव से दूसरे मानव में फैलता जाता है। इस वायरस के संम्पर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति संकर्मित होता जाता है। खास कर यह बीमारी बरसात और शर्दी के नमी वाले मौसम में बहुत तेजी से वाइरल बुखार की तरह लोगो में बहुत फैलती है।

H1N1 वायरस

यह वायरस एक तरह का संक्रामक विषाणु है जो दुनिया भर के सुअरो में पाया जाता है। H1N1 वायरस के सुअरो में पाए जाने के कारन ही इससे होने वाली बीमारी को सुअर इन्फ्लूएंजा जिसे स्वाएन फ्लू, स्अर फ्लू या शूकर फ्लू भी कहते हैं।

इस वायरस के इनफेक्शन ने 2009 और 10 में महामारी का रूप ले लिया था अप्रैल 2009 में इसे सबसे पहले मैक्सिको में पहचाना गया था। और WHO ने 10 अगस्त 2010 में इस महामारी के खत्म होने का भी ऐलान कर दिया था। इसे Swine flu इसलिए कहा गया था क्योंकि सुअर में फ्लू फैलाने वाले इनफ्लुएंजा वायरस H1N1 से ये मिलता-जुलता था।

H1N1 वायरस मनुष्य मे कैसे फैलता है ?

सुअर इन्फ्लूएंजा का H1N1 वायरस सुअरो में मिलता है। स्वस्थ सूअर दूसरे संक्रमित सुअर से स्वाइन फ्लू प्राप्त कर सकता हैं। अगर वे एक संक्रमित सुअर की छोड़ी गई सांस की बूंदों को अपनी साँस में खींचते हैं। उन्हें एक संक्रमित सुअर के साथ प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क के माध्यम से भी संक्रमण हो सकता है।

मानव में स्वाइन फ्लू कैसे फैलता है ?

मानावे शरीर में H1N1 वायरस बहुत कम पाया जाता है। मानव शरीर में H1N1 वायरस सुअरो का अधिक संपर्क में रहने के कारन आता है। या फिर सूअर का मांस ठीक से पका कर ना खाया जाये तो Swine flu virus मानव शरीर में फेल जाता है।

मानव शरीर में H1N1 वायरस के प्रति रोग प्रतिरोग क्षमता बहुत काम होती है, इसलिए शरीर में H1N1 वायरस बहुत तेजी से फैलता है, और पूरा शरीर संक्रमित होकर व्यक्ति की मृत्यु तक हो जाती है।

संक्रमित मानव से स्वस्थ मानव में स्वाइन फ्लू कई कारणों से फैलता है। H1N1 से संक्रमित मानव के संपर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति को यह बीमारी हो सकती है। यह एक मानव से दूसरे मानव में बहुत तेजी से फेल रहा है।

स्वाइन फ्लू होने के कारन आपको पता होना चाहिए। जिससे आप इस रोग के वायरस के चपेट में आने से बच सके, क्युकी इससे से बचाव ही रोकने का बड़ा उपाय है।

  • स्वाइन फ्लू का वायरस हवा में ट्रांसफर होता है|
  • अगर यह वायरस किसी ठोस जगह गिरा तो 24 घंटे तक जीवित रहता है। किसी तरल जगह गिरा तो 20 मिनट जीवित रहता है।
  • खांसने, छींकने, थूकने से वायरस सेहतमंद लोगों तक पहुंच जाता है, और उनको भी रोगी बना देता है।

स्वाइन फ्लू के लक्षण हिंदी में – Symptoms / lakshan of Swine Flu

स्वाइन फ्लू के लक्षण क्या है ? अगर हमे यह पता हो तो H1N1 वायरस से संक्रमित होने पर इसके लक्षणों को देख कर आसानी से पता लगाया जा सकता है।

सुअरो में :-

  • सूअरों में इन्फ्लूएंजा संक्रमण से, बुखार, सुस्ती, छींके, खाँसी , श्वास लेने में कठिनाई और भूख की कमी महसूस होती है
  • संक्रमित सूअरों के शरीर का वजन लगातार कम होता जाता है|
  • संक्रमण से गर्भपात भी हो सकता है।
  • संक्रमित सुअरो की मर्त्यु होने लगती है।

मानव में:-

मनुष्यों में शूकर इन्फ्लूएंजा का मुख्य लक्षण हैं: –

  • इस रोग के होने पर बुखार होता है। अगर बुखार लम्बे समय तक ठीक ना होतो यह स्वाइन फ्लू हो सकता है।
  • सर्दी जुकाम होना आप बात है। अगर लगातार नाक बहना और सर्दी जुकाम होते रहे तो ये स्वाइन फ्लू हो सकता है।
  • लगातार खांसी बने रहना और साधारण इलाज से भी खाँसी में आराम ना आना।
  • सिर में दर्द रहना, मांस पेसियो में व पुरे बदन में दर्द रहना।
  • जोड़ों में कठोरता और दर्द का महसूस करना।
  • पेट ख़राब होना और उल्टी दस्त का लगातार होते रहना। इलाज करने पर भी आराम ना पड़ना।
  • ठंड लगना, तेजी से साँस का चलना और साँस लेने में कठिनाई महसूस करना इसका मुख्य लक्षण है।
  • भूख ना लग्न और लगातार वजन कम होते जाना तथा कमजोरी आना।
  • थकावट होना और चिड़चिड़ापन बहुत अधिक महसूस करना।
  • स्वाइन फ्लू की आंशका होने पर यदि उसके इलाज में देरी हो तो मानव की मृत्यु तक हो सकती है।

स्वाइन फ्लू से बचने के उपाये

अगर स्वाइन फ्लू से बचने का तरीका पता हो, तो इससे आसानी से बचा जा सकता है। इसके लिए जरुरी है की कुछ सावधानी बरती जाये।

  • वायरस से बचाव के लिए जरूरी है घर को साफ-सुथरा रखें। सिर्फ घर को ही नहीं बल्कि घर के आसपास में भी सफाई रखें।
  • यदि घर में कोई स्वाइन फ्लू या इन्फ़्लुएन्ज़ा से पीडि़त है तो उसे अलग से साफ-सुथरे कमरे में रहने दें, और कम से कम लोगो को मिलने दे।
  • पीडि़त व्यक्ति के कमरे की सफाई रखें कपड़े, साबुन और अन्य प्रयोग की चीजों को भी अलग रखें।
  • पीडि़त व्यक्ति को हर समय अपने पास टिश्यू पेपर या फिर साफ-सुथरे रूमाल रखने चाहिए। टिश्यू को इस्तेमाल करने के बाद तुरंत कूड़ेदान में फेंकें।
  • बहार से घर आने पर अपने हाथ साबुन से जरूर धोये। तथा अपने घर के दरवाजों के हेंडल, कीबोर्ड, मेज आदि साफ करते रहे।
  • यदि आपको जुकाम के लक्षण दिखाई दें तो घर से बाहर ना जाएं और दूसरों के नजदीक ना जाएं। या अगर किसी को सर्दी जुखाम है, तो उसके नजदीक ना जाये।
  • अगर आपके शहर में स्वाइन फ्लू का प्रकोप बढ़ रहा है। तो कोशिश करें की स्वाइन फ्लू प्रभावित जगह में जाने से पहले फेसमास्क पहन लें।

स्वाइन फ्लू का इलाज

स्वाइन फ्लू के उपचार मुमकिन है। टैमीफ्लू और रेलिंज़ा नामक वायरस मारक दवाओं से सफलतापूर्वक इलाज किया जाता है। अगर किसी को H1N1 वायरस का संक्रमण होना सुरु ही हुआ है। और इसके सुरुवाती लक्षणों से पता चल जाता है, तो आसानी से इलाज कर के उसे स्वस्थ किया जा सकता है।

  • यह बीमारी होने पर रोगी को एंटीरेट्रोवायरल जैसी विषाणुरोधक दवाएं भी दी जाती हैं।
  • युवाओं में बुखार और ठंड से बचने के लिए पैरासिटामाल दिया जाता है।
  • बच्चों को कभी कभी अतिरिक्त उपचार की आवश्यकता होती है।
  • 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को एस्पिरिन जैसी दवाएं नहीं देनी चाहिए।
  • अगर रोगी ठीक ना हो रहा हो तो, स्वाइन फ्लू की एंटीबयोटिक दवा टैमीफ्लू और रेलिंज़ा दी जाती है। जिससे मानव शरीर से इन्फ्लूएंजा वायरस ( H1N1 ) पूरी तरह ख़तम हो जाता है।

स्वाइन फ्लू ( Swine flu ) की दवाओं को कभी भी खुद से नहीं लेना चाहिए। किसी अच्छे चिकिस्तक से या हॉस्पिटल में अपना इलाज करना चाहिए। वैसे सर्दी-जुखाम जैसे लक्षणों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली तुलसी, गिलोए, कपूर, लहसुन, एलोवीरा, आंवला जैसी आयुर्वेदिक दवाईयों से भी स्वाइन फ्लू ( Swine flu ) का आयुर्वेदिक इलाज में बेहतर असर देखा गया है।

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